मैं रुकने वालों में से नहीं हूँ

एक समय की बात है, एक युवक रात देर तक अकेले काम किया करता था। लोग उसका मज़ाक उड़ाते थे, कहते थे — “तुमसे नहीं होगा… तुम हार जाओगे…” धीरे-धीरे वह डरने लगा। उसे ऐसा महसूस होने लगा जैसे उसके पीछे हमेशा कोई अंधेरा साया खड़ा है… डर, असफलता और लोगों की बातें उसे अंदर से कमजोर कर रही थीं। लेकिन एक दिन उसने आईने में खुद को देखा और कहा —
“डर मुझे रोक नहीं सकता। अगर मेरे सपने बड़े हैं, तो मेरी हिम्मत भी बड़ी होगी।” उस दिन के बाद उसने लोगों की आवाज़ नहीं, अपने लक्ष्य की आवाज़ सुननी शुरू कर दी। रातें अब भी अंधेरी थीं, मुश्किलें अब भी थीं, लेकिन अब वह डरकर नहीं, लड़कर आगे बढ़ रहा था।
कुछ समय बाद वही लोग, जो उसका मज़ाक उड़ाते थे, उसकी सफलता की मिसाल देने लगे। सीख: डर हमेशा आपके पीछे खड़ा रहेगा, लेकिन जीत उसी की होती है जो मुड़कर डर को देखे और कहे — “मैं रुकने वालों में से नहीं हूँ।”

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